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Sunday, February 12, 2012


बांग्लादेश में दलित जीवन


लेखक : नइमुल करीम , अनुवादक : आनन्द पाण्डेय


कल्पना कीजिये एक ऐसी जिंदगी की जिसमें किसी स्त्री-पुरुष को अपनी पहचान हर दिन समाज से खारिज हो जाने  से बचने के लिए छुपानी पड़ती हो, जिसमें व्यक्ति को इंसान द्वारा निर्मित अतार्किक व्यवस्था की वजह से हर स्तर पर दण्डित होना पड़ता हो. इस तरह की नारकीय जिंदगी के लिए किसी दलित परिवार में पैदा हो जाना ही काफी है. सबसे खतरनाक तो यह है कि सरकार इस अमानवीय प्रथा की ओर आँखें  बंद किये है.

बांग्लादेश में दलितों की आबादी लगभग १ करोड़ है. बांग्लादेश दलित परिषद् के अनुसार यह आबादी भारतीय उप महाद्वीप का सबसे उपेक्षित समुदाय है.  बांग्लादेश दलित परिषद्  के संयोजक विकास कुमार दास कहते हैं , “नेपाल और भारत जैसे देशों में ऐसे कानून हैं जो दलितों की भेदभाव से रक्षा करते हैं. ऐसे देशों में दलित उत्पीड़न के खिलाफ न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जा सकता है. लेकिन, ४० सालों के बाद भी यहाँ कोई नियम नहीं है जो हमारी रक्षा कर सके. आज भी हमें अछूत माना जाता है.”

अनुसूचित जाति के नाम से भी जाना जाने वाला दलित समुदाय हिन्दू जाति-व्यवस्था की सबसे निचली जाति है.  सदियों से यह जाति सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और अन्य विविध आधारों पर भेदभाव का शिकार रही है.  जिसके फलस्वरूप सामान्य जनता से प्रतियोगिता करने के लिए इन्हें संघर्ष करना पड़ता है. इन्हें आज भी गटर सफाई, जूता पॉलिश,  सफाई जैसे अपने परम्परागत पेशे में ही फंसे रहना पड़ता है. नाम-शूद्र से लेकर ऋषि तक कई दलित उपजातियां पूरे देश में पायी जाती हैं.  फ़िर भी उन्हें भेदभाव से बचाने  के लिए कोई वैधानिक व्यवस्था नहीं की गयी है. यद्यपि कि संविधान जाति आधारित भेदभाव को निषिद्ध ठहराता है फ़िर भी दलितों का मानना है कि उन्हें  सुरक्षात्मक हस्तक्षेप की आवश्यकता है. बांग्लादेश दलित परिषद् के सदस्य मिलन दास कहते हैं,  “हम ऐसा कानून चाहते हैं जो खासतौर पर दलितों के उत्पीड़न को निषिद्ध करे. समाज में बेहतर जगह पाने के लिए हमारे लिए एकमात्र यही रास्ता है.” 

अपनी निराशाजनक कहानी बयां करते हुए कुमार दास कहते हैं कि अपने परम्परागत पेशे छोड़कर मनमाफिक रोजगार करना और समाज की मुख्यधारा में जगह बनाना बहुत मुश्किल है. वह कहते हैं , “छः महीने मेडिकल प्रैक्टिस के बाद मैंने दवा की दुकान खोलनी चाही. जब मैंने अपने सहकर्मियों से इस बात की चर्चा की तो उन लोगों ने सलाह दी कि यह घाटे का सौदा होगा क्योंकि एक दलित की दुकान से कोई भी दवा नहीं खरीदेगा.”  दास ने उसी दिन अपनी नौकर छोड़ दी और फ़िर कभी लौट कर नहीं गए. उन्होंने बांग्लादेश दलित परिषद् के लिए काम शुरू कर दिया. बांग्लादेश दलित परिषद्  दलितों की जिंदगी को बदलने की कोशिश करने वाले कुछ संगठनों में से एक है. दास कहते हैं, “नौकरियों की बात भूल जाइये, हमें तो साक्षात्कार के लिए भी नहीं बुलाया जाता क्योंकि हमारे नाम से ही हमारी पहचान का पता चल जाता है.”  नौकरियों में आरक्षण के महत्व पर जोर देते हुए दलित परिषद् कहती है कि सार्वजानिक क्षेत्र में कड़ी प्रतिस्पर्द्धा के कारण दलितों के लिए नौकरी पाना टेढ़ी खीर हो गया है. कुमार दास कहते हैं, “पूरे जीवन हम शिक्षा, और अन्य सामाजिक कारकों में पीछे रहे इसलिए सामान्य जनता के साथ प्रतियोगिता करना हमारे लिए संभव नहीं है.”

पिछले कुछ सालों में  बांग्लादेश हरिजन परिषद्  और बांग्लादेश दलित परिषद्  जैसे संगठनों के उभार हुए हैं. जिन्होंने दलितों में जागरूकता और संघर्ष की भावना का प्रसार किया है. विभिन्न संगोष्ठियों के माध्यम से वे सिविल सोसाइटी का समर्थन हासिल करने में कामयाब हुए हैं.  यद्यपि कि कुछ प्रगति हुई है लेकिन समुदाय के नेताओं का मानना है कि और अधिक लाभ उठाने के लिए दलितों का संसद में प्रतिनिधित्व जरूरी है. कुमार दास कहते हैं , “किसी भी राजनीतिक दल में दलितों के प्रतिनिधि नहीं हैं.  उपजिला से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक कोई भी दलित नहीं है. कोई भी हमारे बारे में नहीं सोचता है. इसलिए राजनीतिक रूप से हम बहिष्कृत हैं और यह एक बड़ी समस्या है.”  दास और आगे कहते हैं कि अवामी लीग समेत कई दलों ने २००९ के चुनावी घोषणा-पत्र में दलितों के लिए कई वादे किये थे लेकिन आज तक सरकार ने कुछ भी नहीं किया है. दलित परिषद् के सदस्य राजनीतिक दलों को उन्हें महज वोट बैंक समझने का दोषी मानते हैं. 

हाल ही में संपन्न एक सम्मलेन में दलित परिषद् के एक सदस्य ने कहा कि चुनाव परिणाम जो भी हों, विजयी दल अंत में दलितों की निंदा ही करता है. बांग्लादेश दलित परिषद् के सदस्य अशोक दास कहते हैं, “ सत्तारूढ़ दल ने हमारे लिए कभी भी कुछ नहीं किया है. हमारे संगठनों (बीडीपी-बीएचपी) को धन के लिए मानुषेर जन जैसे गैर सरकारी संगठनों पर निर्भर रहना पड़ता है.

चुनाव से जुड़ी एक घटना का जिक्र करते हुए कुमार दास कहते हैं, “हाल में मेरे एक रिश्तेदार उपजिला चुनाव में खड़े  हुए. नामांकन के बाद हम लोगों ने उनका समर्थन करना शुरू किया. पूरा सवर्ण समाज इसके खिलाफ था. उन्होंने घिनौने नारे लगाये और हमारे समुदायों को अपमानित किया. आखिरकार हमारे प्रत्याशी को चुनाव से अलग होना पड़ा.”

यद्यपि कि यह एक कठिन काम है फ़िर भी बीडीपी और बीएचपी का मानना है कि  सरकार अंततः हमारी मांगों को मानेगी इसलिए इस दिशा में इन संगठनों ने कदम उठाना शुरू कर दिया है. उदाहरण के लिए राष्ट्रीय दलित आयोग के गठन की योजना इनमें से एक है. अशोक दास कहते हैं, “हमारा लक्ष्य है एक दलित आयोग का गठन जो हमें मुख्यधारा से जोड़ने और अन्य कई जरूरतों को पूरा करने में हमारी मदद करेगा.”  वह कहते हैं,  “अभी हमारा लक्ष्य है संगठित शक्ति होना.”

बीडीपी के अनुसार दलित महिलाओं के विरूद्ध अत्याचार एक अन्य प्रमुख समस्या है जिस पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया है. अशोक दास कहते हैं कि दलित महिलाएं दोहरे दमन का शिकार हैं. पहले तो औरत होने के नाते और दूसरे दलित होने के नाते. कुमार दास कहते हैं, “हमारे समुदाय की महिलाओं के लिए सवर्ण लोगों ने ‘मुचीर बो, शोबार शुन्दोरी भाभी’  जैसी कहावतें चला रखी हैं, जिसका अर्थ होता है कि दलित स्त्रियों को छेड़ने में कुछ भी बुरा नहीं है.”

अनारक्षण की नीति ने शिक्षा के क्षेत्र को भी प्रभावित किया हुआ है. दलित छात्रों को इसकी वजह से संस्थाओं में प्रवेश के लिए भटकना पड़ता है. बीडीपी से सम्बद्ध एक शिक्षाशास्त्री दावा करते हैं, “एससी छात्र हाई स्कूल में कम नम्बरों की वजह से विश्वविद्यालयों द्वारा खारिज कर दिए जाते हैं.  सुविधाहीनता में ये इतने ही नम्बर ला सकते हैं.” इसके आलावा जिन छात्रों का सरकारी विश्वविद्यालयों में प्रवेश हो भी जाता है वे अपनी पहचान छुपाते हैं ताकि किसी प्रकार की प्रतिक्रिया से बचे रह सकें.” सत्कारी राजकीय महाविद्यालय के छात्र बशुदेब दास बाबुल कहते हैं, “दलित छात्र अपनी पहचान नहीं उजागर करते हैं क्योंकि उन्हें अलग मेस में खाने या अलग  होस्टल में रहने के लिए मजबूर किया जा सकता है.” वे आगे कहते हैं कि परिसरों में उन्हें समान अवसर नहीं मुहैया कराये जाते.

बाबुल उदाहरण के लिए, अपने बारे में बताते हैं, “मैं बांग्लादेश छात्र लीग का सक्रिय सदस्य हुआ करता था और प्रायः राजनीतिक भाषण भी देता था. लेकिन जब लोगों को पता चला कि मैं ऋषि हूँ, तो उन लोगों ने मेरी उपेक्षा करनी और मुझे खारिज करना शुरू कर दिया.” वह आगे कहते हैं कि मेरी जाति का पता चल जाने के बाद लोगों ने मुझे महाविद्यालय में महामंत्री बनने से रोक दिया.  बहुत से अन्य दलित छात्रों की तरह बाबुल को भी जाति की वजह से नौकरियों के लिए मना कर दिया जाता था. फ़िलहाल वे बीडीपी को सहायता देने वाली परित्राण नामक गैर सरकारी संस्था में काम कर रहे हैं. बीडीपी के अन्य सदस्यों की तरह बाबुल भी मानते हैं कि सार्थक बदलाव के लिए दलितों को राजनीति में मौका चाहिए.

समान अवसर के तर्क के आधार पर विरोधी दलितों के लिए आरक्षण की नीति का विरोध करेंगे लेकिन उन्हें उस दर्द और अपमान को समझने की कोशिश करनी चाहिये जिससे वे सदियों से गुजर रहे हैं. यह असंभव है कि असमानता की जमीन पर खड़े होकर वे समाज में जगह बना पाएंगे. उम्मीद है, सत्ता में बैठे लोग आरक्षण के माध्यम से भारत में दलितों की उल्लेखनीय प्रगति से प्रेरित होंगे और देश के लगभग १ करोड़ दलितों को कुछ इसी तरह के कदम उठाकर देशवासी होने का  अहसास दे पाएंगे.
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नइमुल करीम बांग्लादेश के अग्रणी मीडिया समूह ‘द डेली स्टार’ के फीचर लेखक हैं. आनन्द पाण्डेय,पी.एचडी, राजनीतिक कार्यकर्त्ता, अनुवादक  और लेखक हैं.  यह लेख उक्त समूह की मासिक पत्रिका ‘फोरम’ के फरवरी अंक में 'अनहर्ड  वायसेज' नाम से छपा था. वहीं से लेकर इसका अनुवाद किया गया है.


Saturday, February 11, 2012

हिंदी आलोचना और राजनीति





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Friday, December 30, 2011

संसदेतर राजनीति का लोकतंत्र

संसदेतर राजनीति का लोकतंत्र

Dr. Anand Pandey

अन्ना हजारे का जन लोकपाल भले ही संसद ने पारित न किया हो और उन्हें अपने अनशन को बीच में ही समाप्त कर दीर्घकालिक राजनीतिक कार्यवाई की घोषणा के लिए बाध्य होना पड़ा हो लेकिन वे अपने उद्देश्य और प्रयास में असफल नहीं माने जा सकते हैं। उन्होंने संसद और राजनीतिक दलों की राजनीति के बरक्स संसदेतर राजनीति को जो नया आयाम दिया है वह अपने समय की एक परिघटना है। इस तरह की राजनीति, जो अपने चरित्र में लोकतांत्रिक तो है लेकिन असंसदीय नहीं, संसदेतर है, का भारत में पिछले कई दशकों में विकास हुआ है। इसने लोकतंत्र के घटते राजनीतिक स्पेस को भरने का काम किया है। असल में लोकतंत्र का अपने देश में जिस तरह से विकास हुआ उससे इस तरह की राजनीति के लिए जगह तैयार हुई है। आप इसे सिविल सोसाइटी कहें या गैर सरकारी संस्थाओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षा लेकिन इतना तो तय है कि ऐसी राजनीति अब सभी तरह की लोकतांत्रिक वैधताओं के साथ एक लोकप्रिय समानांतर सत्ता बन गई है। आज जनता जिसके पास संसदीय लोकतंत्र में सिर्फ दो-चार दलों का विकल्प था, एक नये लोकतांत्रिक हथियार से लैश हो गई है। ऐसे दलों के पाले-दर-पाले में वह वैसे ही गिरती रहती थी जैसे गेंद, लेकिन अब वह जो काम राजनीतिक दलों से नहीं ले सकती वह ऐसे संगठनों से ले सकती है जैसे अन्ना हजारे ने लिया है।
संसदेतर राजनीति की एक पूरक लोकतांत्रिक राजनीति के रूप में सिविल सोसाइटी की उपस्थिति जहां स्पष्ट है वहीं इसका स्वरूप और विचारधारा अस्पष्ट है। इसने कई सवाल उठाए हैं जिनका जवाब शायद उतना स्पष्ट नहीं हो जितना कि स्वयं ये सवाल हैं। सिविल सोसाइटी या गैर सरकारी संगठन की राजनीतिक भूमिका के उदय एवं विकास के ऐतिहासिक, राजनीतिक एवं सामाजिक कारण क्या हैं? ऐसी राजनीति का सरोकार क्या है? ऐसी राजनीति की विचारधारा क्या है? इसकी प्रतिबद्धता किसके प्रति है? ऐसी राजनीति का संगठन कैसा है? इसका सामाजिक आधार क्या है? संसदीय राजनीति से इसका संबंध कैसा है? इसका वर्ग-चरित्र और जाति-चरित्र कैसा है? इत्यादि प्रश्नों पर विचार करने का समय आ गया है। लगभग नौ महीने चले अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन पर इन सवालों को लगातार उठाया गया है और उनके उत्तर भी दिये गये हैं। कभी इंडिया अगेन्स्ट करप्शन की ओर से सफाई के रूप में तो कभी विरोधियों और आलोचकों की ओर से सवाल या आशंका के रूप में। ये सवाल-जवाब अपनी जगह पर हैं और हमारे समय के राजनीतिक यथार्थ एवं स्थिति को स्पष्ट करते हैं। यहां एक सामान्य विवेचन पेश किया जा रहा है।


इस तरह की अवधारणा या परिघटना के उद्भव और विकास के प्राचीन और पश्चिमी परिप्रेक्ष्य को सुविधा के लिए छोड़कर समकालीन भारतीय राजनीतिक परिप्रेक्ष्य को लें तो इसे समझना सरल होगा। इसे समझने के लिए इस सवाल का सहारा लें कि यह किसकी भूमिका अदा कर रहा है? यह एक राजनीतिक मांग को पूरा करने के लिए गैर सरकारी संगठनों की मांग भी है, एक समाजसेवी बुजुर्ग की भ्रष्टाचार के विरूद्ध संघर्ष भी है और मध्यवर्गीय लोगों का आन्दोलन भी है। यह शासन के वर्तमान भ्रष्ट रूप को उजागर करता है और एक पारदर्शी व्यवस्था की मांग करता है। यों तो इस तरह के आन्दोलन वर्तमान भारतीय जीवन के सामाजिक और राजनीतिक लगभग सभी पक्षों को लेकर चल रहे हैं ; मसलन पर्यावरण का प्रश्न, आदिवासी हितों का प्रश्न, मानवाधिकार का प्रश्न, विकास एवं पूंजीवादी शोषण का प्रश्न, सूचना के अधिकार का प्रश्न, रोजगार एवं भूख का प्रश्न इत्यादि सभी कुछ पर इस तरह के प्रयास चल रहे हैं जो सरकार की उपेक्षा या उसकी समझ के कारण उसकी प्राथमिकता में नहीं हैं लेकिन जैसी लोकप्रियता भ्रष्टाचार विरोधी और लोकपाल गठित करने की मांग करने वाले अन्ना हजारे के आन्दोलन को मिली वैसी किसी को नहीं। अपनी व्यापकता और प्रभाव में यह एक अखिल भारतीय आन्दोलन था। संसद और राजनीतिक दलों को लगभग नौ महीने तक जितना इसने उलझाये रखा उतना किसी और आन्दोलन ने नहीं किया। इस आन्दोलन ने इस तरह की संसदेतर लोकतांत्रिक राजनीति की नयी संभावनाओं के द्वार खोले हैं।


कभी इसे जन आन्दोलन का नाम दिया जाता है तो कभी इसे समाज कर्म का लेकिन यह सब एक खास तरह की राजनीति है जो अपने आप में क्रांतिकारी नहीं होते हुए भी सुधारवादी है, हालात में परिवर्तन की हामी है। इसका तेवर लोकतांत्रिक है, इसमें सरकारी राजनीति की तुलना में संवेदनशीलता, प्रतिबद्धता और ईमानदारी अधिक है इसलिए मध्यवर्ग को यह राजनीति अधिक विश्वसनीय लगती है। कुछ असंभव नहीं कि राजनीतिक दलों से थके और निराश मध्यवर्ग अपने लिए इसे और अधिक संगठित करे, संवारे और सरकारों के लिए मनमानी मुश्किल कर दे। उन लोगों के लिए नया मंच बन जाय जो लोग राजनीति तो करना चाहते हैं लेकिन उतना पतित होने को तैयार नहीं हैं जितना नैतिक पतन राजनीति में कामयाब होने के लिए जरूरी हो गई है। एक नये तरह के नेता बनने का मौका ये आन्दोलन देते हैं। मेधा पाटकर, अरूणा राय, अन्ना हजारे, अरविन्द केजरीवाल इत्यादि के नाम किस नेता से कम लोकप्रिय हैं या किस नेता की तुलना में इनका स्टार वैल्यू कम है?


संसद को जिस तरह से इस आन्दोलन ने लोकपाल विधेयक पास करने के लिए बाध्य किया और अपनी शक्ति से निर्देशित किया उससे कुछ सांसद, नेता और बुद्धिजीवी यह मानते हैं कि यह संसदीय राजनीति को समाप्त करने वाला आन्दोलन है। कुछ लोग और आगे गये, खासतौर पर दलितों का एक हिस्सा जो यह प्रचारित करने लगा कि यह बाबा साहेब के संविधान को नष्ट करने का षड्यंत्र है। लालू प्रसाद यादव ने कहा कि ये लोग- टीम अन्ना- तानाशाह हैं और संसद पर ताला लगा देना चाहते हैं। प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में यह आन्दोलन संसदीय राजनीति को समाप्त करना चाहता है या लोकतंत्र को समाप्त करने के षड्यंत्र का हिस्सा है? कुछ की नजर में अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्र। हां, इन चेहरों को चमकाने में अंतर्राष्ट्रीय संगठनों का योगदान अधिक है, इन्हें सेलिब्रेटी के रूप में पहचान भी पश्चिम या अमेरिका ने सुरस्कृत-सम्मानित करके दी। इनके काम से किसी को इन्कार नहीं इसलिए किसी अंतर्राष्ट्रीय इशारे से भी कोई सहज इंकार नहीं कर सकता। लेकिन इस तरह की राजनीति या आन्दोलन के सामाजिक आधार और वर्गीय चरित्र को देखकर यह नहीं कहा जा सकता है कि ये असंसदीय या लोकतंत्र विरोधी हैं। जिस सामाजिक तबके का समर्थन इसे सबसे अधिक था उसमें मध्यवर्ग और मीडिया को सबसे आगे रखा जा सकता है। फिर भी विविध जातियों और वर्गों, सामाजिक समूहों की सहानुभूति और समर्थन इस आन्दोलन को मिला है। इस आन्दोलन का सामाजिक आधार इतना विविध और संश्लिष्ट है, अंतविर्रोधी भी, कि यह किसी तरह के लोकतंत्र विरोधी होने की संभावना को संजो ही नहीं सकता- चाह कर भी।


यह उल्लेखनीय है कि अपने उद्देश्य और चरित्र में यह आन्दोलन न केवल संसदीय आन्दोलन है बल्कि संसदीय राजनीति का पूरक भी है. भ्रष्टाचार के दीमक और घुन से मुक्त कर संसदीय राजनीति को फिर से चमकाने और धार देना ही जाने या अनजाने इस आन्दोलन का चरित्र और नियति है, शायद नीयत भी. निजी तौर पर भी इस आन्दोलन के संगठनकर्त्ता और नेता आमूल व्यवस्था-विरोधी या क्रान्तिकारी नहीं हैं, जैसे माओवादी-नक्सलवादी होते हैं या फिर दक्षिणपंथी-फासीवादी. अन्ना हजारे सेना में थे तो किरण बेदी और अरविन्द केजरीवाल राज्य का सबसे अधिक प्रतिनिधित्व करने वाली संस्थाओं, पुलिस और अफसरशाही में बड़े पदों पर रहे हैं. शांति भूषण केंद्र में मंत्री रहे और वकालत करते हैं. उनके बेटे प्रशांत भूषण भी भारतीय दंड संहिता का व्यापार करते हैं. कुलमिलाकर कहा जाय तो ये सब-के-सब व्यवस्था का अंग हैं या रहे हैं. इसी तरह मुख्यधारा के सिविल सोसाइटी के अधिकांश संगठनों का व्यवस्था से सम्बन्ध है या रहा है. ऐसे आंदोलनों का नुकसान तात्कालिक रूप से किसी भी राजनीतिक दल को हो या सभी दलों का हो क्योंकि कोई नया दल अस्तित्त्व में आ जाय. किन दीर्घकालिक फायदा संसदीय प्रणाली का ही होता है या होगा. शायद इसी कारण कुछ माओवादी और व्यवस्था विरोधी इस आन्दोलन का विरोध कर रहे हैं क्योंकि ऐसे आन्दोलन व्यवस्था की सड़न को दूर करते हैं और ताजगी प्रदान करते हैं, जिससे वह दीर्घजीवी हो उठती है.


सरकारों और राजनीतिक दलों ने गैरसरकारी संगठनों और सिविल सोसाइटी के सदस्यों को अपनी तरह से स्वीकृति और वैधता दी है। पिछले दो दशकों में सिविल सोसाइटी की हैसियत, ताकत और लोकप्रियता को बढ़ाने में सरकार और मुख्यधारा दलों का सकारात्मक-नकारात्मक सहयोग भी काफी हद तक जिम्मेदार रहा है। इसका प्रमाण यह है कि पिछली यूपीए सरकार जिन उपलब्धियों को लेकर गौरवन्वित महसूस करती थी और जो उसके दुबारा चुने जाने में मददगार बनीं उनमें से कई सिविल सोसाइटी के आंदोलनों और मांगों की उपज थींण् सूचना का अधिकार ;अरुणा रॉयद्धए राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना ;ज्यां द्रेज़द्धए फरह नकवी और हर्ष मंदर सांप्रदायिक हिंसा ;रोकथामए नियंत्रण और पीड़ितों के पुनर्वासद्ध विधेयक इत्यादि का नाम लिया जा सकता हैण् सिविल सोसाइटी को अगर कार्पोरेट सेक्टर के बरक्स देखा जाय तो इसकी वास्तविक शक्ति का पता चलेगाण् आज सरकार को एक तरफ कार्पोरेट सेक्टर की बातें और मांगें मनानी पड़ रही है तो दूसरी तरफ सिविल सोसाइटी कीण् राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् की भूमिका कस बरक्स सरकार के तमाम सलाहकार और पदाधिकारियों के बारे में यही बात लागू होती हैण् प्रधानमंत्री समेत मोंटेक सिंह अहलूवालिया और पी चिदंबरम, कौशिक बासु, नंदन निलेकनी आदि कार्पोरेट सेक्टर के हिमायती हैं तो सलाहकार परिषद सिविल सोसाइटी के कार्यकर्र्ताओं के कारण जनता की या वैकल्पिक नीतियों की हिमायती है. एक तरह से इसे कार्पोरेट सेक्टर और सिविल सोसाइटी के बीच संतुलन बनाने का माध्यम भी माना जा सकता है और प्रकारांतर से पूंजीवादी नीतियों और जनवादी नीतियों के बीच भीण् सरकार क्यों अपनी कल्पना शक्ति में इतनी कमजोर हो गयी है कि वह बस मुहर लगाने वाली संस्था हो गयी है. संसद के बारे में भी यही सही हैण् इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो अर्द्ध औपनिवेशिक स्थिति में नव साम्राज्यवाद और उदारीकरण की नीतियों ने जहाँ सरकार की हैसियत को दोयम दर्जे का बना दिया और उसे लगभग जनविरोधी बना दिया है तो सरकारों की सामाजिक और वैचारिक भूमिका को सिविल सोसाइटी ने अपने हाथ में लिया है.

प्रश्न यह उठता है कि सिविल सोसाइटी की बढ़ती शक्ति और लोकप्रियता का राज क्या है? सबसे महत्वपूर्ण बात तो यही कि राजनीतिक पतन ने इसके लिए रास्ता तैयार किया. संसदीय लोकतंत्र पार्टियों की आंतरिक राजनीति का दर्पण होता है. बेहतर राजनीतिक दलों के बिना संसदीय राजनीति सफल नहीं हो सकती. आज का संकट दलों के राजीतिक स्तर का प्रतिफल है. राजनीतिक दलों की कार्य-प्रणाली ऐसी हो गयी जिसमें वैचारिक, सज्जन और नैतिक लोगों के लिए जगह ही नहीं रह गयी. पार्टियों में जाति, धर्म और धन-बल,बाहु-बल के आधार पर जगह बनने लगी. कार्पोरेट जगत ने अपने लिए काम करने वाले नेताओं को चिन्हित कर लिया. नेताओं में कार्पोरेट जगत के सबसे करीबी होने की स्पर्द्धा होने लगी. ऐसे में जो व्यक्ति सैद्धांतिक लाइन लेने वाले थेए कार्पोरेट के हाथ बिकने और मतदाताओं को खरीदने की हद तक नहीं गिर सकते थे, उनके लिए दलों में कोई जगह नहीं बची. राजनीति में विचारधारा और सिद्धांत का अंत हो गया. अवसरवाद एकमात्र सिद्धांत और पूंजीवाद एकमात्र विचारधारा हो गयी. ऐसे परिवेश में जो लोग कुछ अलग करना चाहते थे उनके लिए एक मात्र रास्ता बचाए गैर सरकारी संगठन बनाकर काम करो. आज जनांदोलन राजनीतिक दल नहीं, ये संगठन कर रहे हैं. राजनीतिक दलों ने ऐसे लोगों को साथ रखने की योग्यता दिखाई होती तो सिविल सोसाइटी के बहुत सारे चेहरे उनके साथ होते! आखिर उनको संसदीय लोकतंत्र से कोई सैद्धांतिक दिक्कत तो है नहीं.


अन्ना हजारे के आन्दोलन की विचारधारा की बात करें तो यह स्पष्ट होगा कि इसकी कोई संगठित विचारधारा नहीं है। राष्ट्रीय प्रतीकों और गांधीवाद के रेटॉरिकके आवरण में यह कुछ व्यक्तियों का एक राष्ट्रीय समस्या के निदान के लिए सामूहिक सहयोग अधिक है। इस आन्दोलन के नेता यह कहते रहे कि वे राजनीति से दूर हैं लेकिन वे राजनीति से दूर न होकर मोट-मोटी दलीय राजनीति से दूर जरूर हैं। एक अर्थ में वे जरूर अराजनीतिक हैं। वह अर्थ है एक खास विचारधारा के आधार पर संगठित न होने का। यह अराजनीतिक होती भारतीय राजनीति परिदृष्य का एक और रोचक उदाहरण पेश करती है जिसमें विचारधारा से अधिक विचार महत्वूपर्ण होते हैं और सामान्य कारण के लिए लोग इकट्ठे होते हैं। लेकिन पूंजीवाद के प्रति इनका क्या दृष्टिकोण है? कुछ साफ नहीं। इससे यह स्पष्ट होता है कि मुख्यधारा के राजनीतिक दलों की तरह यह भी तरह तरह के कॉस्मेटिक मुद्दों की राजनीति में उलझा है और पूंजीवाद के खिलाफ कोई संकट बनने से बचना चाहता है। वरना किसको मालुम नहीं कि इतने बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के लिए औपनिवेशिक विरासत और अंतर्राष्ट्रीय पूंजीवाद और भारत की नव आर्थिक नीतियां ही जिम्मेदार हैं और किसी एक संस्था और विधान के निर्माण से भ्रष्टाचार को नहीं मिटाया जा सकता है। अगर वे पूंजीवाद के खिलाफ उठना चाहते तो भ्रष्टाचार विरोध की तार्किक परिणति अनिवार्यतः नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के विरोध में होती। सिर्फ एक लोकपाल के गठन में निश्चय ही नहीं। अब हो सकता है कि राजनीतिक दल या नेता घूस न लें और मुफ्त में भ्रष्टाचार करें और पूंजीपतियों को लाबिइंग का खर्च भी न देना पड़े। अफसरशाही और व्यवस्था में जो घूसखोरी और दलाली की संरचनात्मक पंरपरा है उसके समाप्त होने की संभावना तो नहीं लगती।


सिविल सोसाइटी आन्दोलन की जीत-हार और शक्ति-सीमा को इस परिप्रेक्ष्य में देखने पर यह स्पष्ट होता है कि इस देश में आने वाले दिनों में संसदेतर राजनीति और अधिक सुदृढ़ होगी और जनता को यह आश्वासन रहेगा कि वह विकल्पहीन नहीं है, उसके पास विकल्प हैं। बावजूद इसके कि यह विकल्प भी उन ताकतों के हाथों का खिलौना जरूर बना रहेगा जिनके हाथों में दुनिया भर की संसदीय राजनीति बंजर हो गई है और संसदीय राजनीति के बारे में महात्मा गांधी की मान्यताओं को सही साबित कर दिया है।

Thursday, December 15, 2011

डर्टी पिक्चर : देह से मुक्ति का राग




डर्टी पिक्चर : देह से मुक्ति का राग
डॉ आनंद पाण्डेय





स्त्री मुक्ति का सपना आज भी मानव-समाज के लिए एक चुनौती है. फिल्म, साहित्य, राजनीति और कलाओं में विभिन्न रूपों में स्त्री मुक्ति की तड़प और प्रयास दिखाई देते हैं.खासतौर पर जब किसी कथा, कला, या फिल्म की रचना के केंद्र में स्त्री का चरित्र हो तब स्त्री-मुक्ति के संदर्भ में उसकी सफलता-असफलता का मूल्यांकन किया जाता है. सहज ही स्त्री मुक्ति का प्रश्न उसके मूल्यांकन की एक केन्द्रीय कसौटी हो जाता है. मिलन लूथरिया की हालिया फिल्म 'डर्टी पिक्चर' ने स्त्री मुक्ति के प्रश्न को आज के सामान्य पढ़े-लिखे तबके से लेकर गंभीर बुद्धिजीवियों के बीच में फिर से उठा दिया है.

सामान्य दर्शक जो किसी फिल्म को सिर्फ मनोरंजन के लिए देखता है, उसके लिए यह फिल्म एक मसाला फिल्म है. जिसमें जीरो साइज़ की बालीवुड नायिकाओं से ऊबे दर्शक को दक्षिण की फिल्मों की मांसल देह यष्टि वाली नायिका के दर्शन होते हैं और जो उसे खूब भाई भी है. लेकिन एक वर्ग है जो पॉपुलर कल्चर को बौद्धिक विषय बनाकर उसे विचारधारा या सामाजिक सरोकारों के आधार पर देखता-परखता है. इस वर्ग का एक हिस्सा इस फिल्म को वैसे ही ख़ारिज करता है जैसे फिल्म का एक नायक इब्राहीम (इमरान हाशमी) करता है. तो दूसरा हिस्सा फिल्म को नारी-मुक्ति के लिए प्रतिबद्ध फिल्म की तरह से लेता है. और उसे देह पर अधिकार के माध्यम से नारी मुक्ति की समर्थक फिल्म मानता है. हमें ऐसी कोई जानकारी नहीं मिली है कि फ़िल्मकार ने कोई प्रतिबद्ध फिल्म बनाने के मकसद से यह फिल्म बनायी है. फिल्म की एक महिला पत्रकार की सिल्क के चरित्र और व्यक्तित्व पर की गयी सकारात्मक टिप्पणियों के आलावा इस वर्ग के लोगों के पास स्त्री- विमर्श की वह देह-केन्द्रित मान्यता भी तर्काधार के रूप में मौजूद है जिसके अनुसार स्त्री के देह पर पुरुष का अधिकार है, अगर स्त्री अपने शरीर पर दावा करती है तो यह एक मुक्तिकामी प्रयास है.

हाँ, यह सही है कि जब स्त्री अपने देह पर अपना अधिकार दिखाती है तो वह उस पर पुरुष के आधिपत्य को चुनौती देती है. स्त्री विमर्श में भी स्त्री की लैंगिकता और देह को अपने इच्छानुसार इश्तेमाल करने को उसकी मुक्ति का एक रास्ता माना गया है. इन बातों से यहाँ इंकार की बजाय यह स्थापित करने कि कोशिश की जा रही है कि इस मान्यता की सीमायें स्पष्ट हैं और अनुभव यह बताता है कि इससे स्त्री की मुक्ति संभव नहीं है. मुक्ति की स्थिति उद्देश्य की पूर्णता है. देह मुक्ति से स्त्री मुक्ति नहीं हो सकती. मुक्ति के लिए चेतना की मुक्ति अनिवार्य शर्त है. देह की मुक्ति आरंभिक अवस्था या एक लक्षण है. उद्देश्य की पूर्णता की अवस्था नहीं. बल्कि इससे वह कई ऐसी समस्याओं से घिर जाती है जो उसे और अधिक विवश और पुरुष के लिए सहज लभ्य बना देती हैं. 'डर्टी पिक्चर' की सिल्क एक ऐसी ही लड़की है. 'डर्टी पिक्चर' स्त्री को, अगर वह ऐसा करने का दावा करती है तो, ऐसी ही मुक्ति को सुझाती है जो उसे और नयीं समस्याओं में डाल देती है. और नायिका दुरूपयोग को विवश हो जाती है और अपराधबोध में आत्महत्या कर लेती. यही मुक्ति के शरीरधर्मी प्रयासों की त्रासदी है. यही सिल्क की त्रासदी है.

मुक्ति के इस तरह के देहधर्म-केन्द्रित विमर्श की विडंबना को उजागर करने के लिए सिल्क का चरित्र बहुत मौजू है. वह प्रेम-आकर्षण से फिल्म में आती है, देह के बल पर आगे बढती है, प्रतिशोध में तबाह होती है और इस्तेमाल हो जाने के अपराधबोध से मर जाती है. जहाँ सिल्क का अंत होता है वहां से स्त्री मुक्ति का कौन-सा चरण शुरू होता है? वह आत्महत्या करती है लेकिन उसकी आत्महत्या शहादत नहीं है जो बदलाव की प्रेरणा पैदा करने में सक्षम होती है. वह अँधेरे में आत्महत्या करती है, अकेलेपन में. अगर उसने पुरूषवाद के लिए कोई तार्किक चुनौती पेश की होती तो समाज उस पर पिल पड़ता. तब शायद उसकी हत्या हो जाती या तसलीमा की तरह देश निकाला दे दिया गया होता. सिल्क की त्रासदी देह-केन्द्रित स्त्री मुक्ति के विमर्श की त्रासदी है. ऐसे विमर्श को बढ़ावा देने की बजाय यह फिल्म उसकी निरर्थकता को प्रमाणित करती है. ऐसे विमर्श की विडम्बना को प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त करती है. इस नजरिये से देखें तो यह एक सफल फिल्म है और सार्थक भी. प्रतिबद्ध भी और सामाजिक भी.

सिल्क में मुक्ति की व्यवस्थित चेतना का अभाव है. यह क्या, उसमें मुक्ति की लालसा का भी अभाव है. क्या उसमें विद्रोह-भावना है? वह अपने फ़िल्मी कैरियर में कामयाब होने के लिए स्त्रीत्व के सम्रग्र आख्यान की बजाय, उसके बाजारू रूप का सहारा लेती है. वह वही करती है जो फ़िल्मी दुनिया के बारे में 'कास्टिंग काउच' के नाम से ज्यादा जाना जाता है . पुरुष स्टार के प्रति उसके मन में प्रतिशोध भी कोई सामाजिक आयाम नहीं ग्रहण करता बल्कि एक प्रेमिका के सामाजिक अधिकार से वंचित होने का प्रतिशोध है. वह स्टार के प्रति बचपन से आकर्षण अनुभव करती थी, वह उसे अपना सब कुछ दे देती है लेकिन स्टार यही समझता रहा की यह लड़की भी उन कई लड़कियों की तरह ही है जो अपने शरीर के बल पर धन-दौलत और स्टार बनना चाहती हैं. लेकिन वह एक प्रेमिका का अधिकार चाहती है. नहीं मिलने पर बगावत कर बैठती है और उसे बर्बाद करने की कोई भी प्रविधि इश्तेमाल करती है. इसमें वह कहाँ स्त्री मुक्ति की भावना से लैश रहती है? या उस भावना को आगे बढ़ाती है?

जो लोग यह मानते हैं की 'डर्टी पिक्चर' शरीर के माध्यम से मुक्ति का प्रयास है उहें यह देखना चाहिए कि फिल्म उनकी इस बात का समर्थन करने की बजाय इसका खंडन करती है. शरीर केन्द्रित मुक्ति का प्रयास जहाँ औरत को समस्याओं में उलझाकर उस बर्बाद कर देता है वहीँ उसका वस्तुकरण भी कर देता है. जहाँ स्त्री बाजार के एक उत्पाद की तरह है. दुनिया की क्रय शक्ति का अधिकांश पुरुषों के पास ही तो है. जब वे उसे बंधक बनाकर नहीं रख पाएंगे तो खरीद लेंगे. चाहे उस फिल्मों में गरम सीन देने वाली अभिनेत्री के रूप में या विश्व सुंदरी के रूप में या एक सेक्स वर्कर के रूप में. इस वस्तुकरण से बचना स्त्री के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि यह उसके अमानवीकरण का आकर्षक माध्यम भी है, जिसे बाजार एक षड़यंत्र की भांति रचता है. यह फिल्म शरीर धर्मी मुक्ति-विमर्श की विडंबना को उजागर करती है.



Sunday, October 30, 2011

ऐ चकोर!

उड़ो-उड़ो उन्मुक्त
चन्द्र को अपने छोड़
ऐ चकोर!
गगन के छोर-छोर.
तुम पंछी, पंख तुम्हारे
मुक्त बनो! तज अंक हमारे
हम निश्छल पंख विहीन
दाग-धब्बे युक्त दीन.
तुम सक्षम जीव, धरो रूप नित नवीन
हम निर्जीव, पर सुनो! नहीं हृदयहीन.
तुम उड़ो-उड़ो मुक्त
पर मैं नहीं अभियुक्त
ऐ, चकोर!

Saturday, September 24, 2011

Parliamentary Politics And Civil Society by Anand Pandey

Parliamentary Politics And Civil Society

by Anand Pandey

आजकल भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन ने संसदीय राजनीति के पतन को उघाड़ने और सरकार की उपस्थिति को एक शोक गीत के रूप में प्रतीकित कर दिया है. अन्ना हजारे के नेतृत्व वाले इस आन्दोलन को व्यापक लोकप्रियता मिली है और इस आन्दोलन की शक्ति और संभावनाएं अभी भी बनी हुई हैं. इस आन्दोलन का वैचारिक विरोध भी हो रहा है. समाज के अलग-अलग वैचारिक और जातीय वर्गों की तरफ से. कोई इसे प्रतिक्रांतिकारी कह रहा है तो कोई इसे सवर्ण-हिंदूवादी. इसके साथ ही साथ अन्ना के अतिरिक्त संगठन कर्यकर्ताओं पर भी तरह-तरह से उंगलियाँ उठ रही हैं. लेकिन असल में इस आन्दोलन और इसके पहले के सारे जनांदोलन बुनियादी रूप से पतित हो चुकी संसदीय राजनीति पर अब सीधे-सीध उंगली उठा रहे है.

जो लोग यह सोचते थे कि जनता अब केवल राजनीतिक दलों और उनके नेताओं के हाथों बंधक हो गयी है और उसे केवल खरीदा, धमकाया और भटकाया जा सकता है, उन्हें भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन एक पहेली लग रहा है. इस आन्दोलन का महत्व इसी बात में है कि इसने पूरे राजनीतिक वातावरण के लिए एक ताज़ा हवा का झोंका की तरह से काम किया है. अन्ना द्वारा प्रस्तावित लोकपाल विधेयक पर बहस का विकल्प खुला हुआ है और उनकी बातों से सहमति और असहमति दोनों स्वाभाविक हैं.

यह उल्लेखनीय है कि, अपने उद्देश्य और चरित्र में यह आन्दोलन न केवल संसदीय आन्दोलन है बल्कि संसदीय राजनीति का पूरक भी है. भ्रष्टाचार के दीमक और घुन से मुक्त कर संसदीय राजनीति को फिर से चमकाने और धार देना ही जाने या अनजाने इस आन्दोलन का चरित्र और नियति है, शायद नीयत भी. निजी तौर पर भी इस आन्दोलन के संगठन कर्त्ता और नेता आमूल व्यवस्था-विरोधी या 'क्रांतिकारी' नहीं हैं. जैसे माओवादी-नक्सलवादी होते हैं या फिर दक्षिणपंथी-फासीवादी. अन्ना हजारे सेना में थे तो किरण बेदी और अरविन्द केजरीवाल राज्य का सबसे अधिक प्रतिनिधित्व करने वाली संस्थाओं, पुलिस और अफसरशाही, में बड़े पदों पर रहे हैं. शांति भूषण केंद्र में मंत्री रहे और वकालत करते हैं. उनके बेटे प्रशांत भूषण भी भारतीय दंड संहिता का व्यापार करते हैं. कुलमिलाकर खा जाय तो ये सब-के-सब व्यवस्था का अंग हैं या रहे हैं. इसी तरह मुख्यधारा के सिविल सोसाइटी के अधिकांश संगठनों का व्यवस्था से सम्बन्ध है या रहा है. ऐसे आंदोलनों का नुकसान तात्कालिक रूप से किसी भी राजनीतिक दल को हो या सभी दलों का हो क्योंकि कोई नया दल अस्तित्त्व में आ जाय.लेकिन दीर्घकालिक फायदा संसदीय प्रणाली का ही होता है या होगा. शायद इसी कारण कुछ माओवादी और व्यवस्था विरोधी इस आन्दोलन का विरोध कर रहे हैं. क्योंकि ऐसे आन्दोलन व्यवस्था की सडन को दूर करते हैं और ताजगी प्रदान करते हैं, जिससे वह दीर्घजीवी हो उठती है.

पिछले करीब दो दशकों में सिविल सोसाइटी की हैसियत, ताकत और लोकप्रियता बढ़ी है. इसका प्रमाण यह है कि पिछली यूपीए सरकार जिन उपलब्धियों को लेकर गौरवन्वित महसूस करती थी और जो उसके दुबारा चुने जाने में मददगार बनीं उनमें से कई सिविल सोसाइटी के आंदोलनों और मांगों की उपज थीं. सूचना का अधिकार (अरुणा रॉय), राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (ज्यां द्रेज़), फरह नकवी और हर्ष मंदर सांप्रदायिक हिंसा (रोकथाम, नियंत्रण और पीड़ितों के पुनर्वास) विधेयक इत्यादि का नाम लिया जा सकता है. सिविल सोसाइटी को अगर कार्पोरेट सेक्टर के बरक्स देखा जाय तो इसकी वास्तविक शक्ति का पता चलेगा. आज सरकार को एक तरफ कार्पोरेट सेक्टर की बातें और मांगें मनानी पड़ रही है तो दूसरी तरफ सिविल सोसाइटी की. राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् की भूमिका कस बरक्स सरकार के तमाम सलाहकार और पदाधिकारियों के बारे में यही बात लागू होती है. प्रधानमंत्री समेत मोंटेक सिंह अहलूवालिया और पी चिदंबरम, कौशिक बासु, नंदन निलेकनी आदि कार्पोरेट सेक्टर के हिमायती हैं तो सलाहकार परिषद सिविल सोसाइटी के कार्य कर्र्ताओं के कारण जनता की या वैकल्पिक नीतियों की हिमायती है. एक तरह से इसे कार्पोरेट सेक्टर और सिविल सोसाइटी के बीच संतुलन बनाने का माध्यम भी माना जा सकता है और प्रकारांतर से पूंजीवादी नीतियों और जनवादी नीतियों के बीच भी. सरकार क्यों अपनी कल्पना शक्ति में इतनी कमजोर हो गयी है कि वह बस मुहर लगाने वाली संस्था हो गयी है. संसद के बारे में भी यही सही है. इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो अर्द्ध औपनिवेशिक स्थिति में नव साम्राज्यवाद और उदारीकरण की नीतियों ने जहाँ सरकार की हैसियत को दोयम दर्जे का बना दिया और उसे लगभग जनविरोधी बना दिया है तो सरकारों की सामाजिक और वैचारिक भूमिका को सिविल सोसाइटी ने अपने हाथ में लिया है.

प्रश्न यह उठता है कि सिविल सोसाइटी की बढ़ती शक्ति और लोकप्रियता का राज क्या है? सबसे महत्वपूर्ण बात तो यही कि राजनीतिक पतन ने इसके लिए रास्ता तैयार किया.संसदीय लोकतंत्र पार्टियों की आंतरिक राजनीति का दर्पण होता है. बेहतर राजनीतिक दलों के संसदीय राजनीति सफल नहीं हो सकती. आज का संकट दलों के राजीतिक स्तर का प्रतिफल है.राजनीतिक दलों की कार्य प्रणाली ऐसी हो गयी जिसमें वैचारिक, सज्जन और नैतिक लोगों के लिए जगह ही नहीं रह गयी. पार्टियों में जाति, धर्म और धन-बल, बाहु-बल के आधार पर जगह बनने लगी. कार्पोरेट जगत ने अपने लिए काम करने वाले नेताओं को चिन्हित कर लिया. नेताओं में कार्पोरेट जगत के सबसे करीबी होने की स्पर्द्धा होने लगी. ऐसे में जो व्यक्ति सैद्धांतिक लाइन लेने वाले थे, कार्पोरेट के हाथ बिकने और मतदाताओं को खरीदने की हद तक नहीं गिर सकते थे, उनके लिए दलों में कोई जगह नहीं बची. राजनीति में विचारधारा और सिद्धांत का अंत हो गया. अवसरवाद एकमात्र सिद्धांत और पूंजीवाद एकमात्र विचारधारा हो गयी. ऐसे परिवेश में जो लोग कुछ अलग करना चाहते थे उनके लिए एक मात्र रास्ता बचा, गैर सरकारी संगठन बनाकर काम करो. आज जनांदोलन राजनीतिक दल नहीं, ये संगठन कर रहे हैं. राजनीतिक दलों ने ऐसे लोगों को साथ रखने की योग्यता दिखाई होती तो सिविल सोसाइटी के बहुत सारे चेहरे उनके साथ होते! आखिर उनको संसदीय लोकतंत्र से कोई सैद्धांतिक दिक्कत तो है नहीं.

अगर हम भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के सन्दर्भ में दलीय राजनीति की राजनीतिक समझदारी और लोकतान्त्रिक संवेदनशीलता को परखें तो वह मूर्खतापूर्ण और राजनीतिक विवेक से शून्य हो गयी है. सरकार ने वह सब कुछ किया जो उसे करना चाहिए था लेकिन सब कुछ खोकर, अपनी इच्छा से नहीं जन-दबाव में आकर. पूरे समय एक राजनीतिक नेतृत्व की कमी खलती रही. इस विवेक शून्यता का कांग्रेस को ही भुगतना होगा, प्रकारांतर से उसने संसदीय प्रक्रिया की भी साख को काम किया. आन्दोलन ने प्रश्नों को अनजाने ही उठा दिया है उनमें से दलीय राजनीति का प्रश्न भी है. उसने दलीय राजनीति में सुधार और उसके स्तर को और अधिक ऊँचा उठाने की जरूरत को रेखांकित किया है. अब देखना है कि राजनीतिक दल इससे कितनी सीख लेते हैं. इस सीख पर ही न केवल संसदीय राजनीति का भविष्य निर्धारित होगा बल्कि सिविल सोसाइटी कि भूमिका और जगह भी तय होगी.